राधिका
आज आसमान रोज़ के मुकाबले ज्यादा मनमोहक दिखाई पड़ रहा है, एक अलग सौंदर्य और शांति बादलों में से रिस रही है,
मेरी नज़र में सामने एक छोटा टीला है जिस पर हरी नर्म दूब ऊगी है, जो गायों के लिए अत्यंत स्वादिष्ट हैं, गायों के बछड़े अपनी मां के थन से दूध पी रहे हैं, आज शकुन अच्छा है।
सूर्यदेव की कांति भी आज देखने लायक है, ना तो ज्यादा ताप है ना ही ज्यादा ठंडक, एक समानुपात मौसम है।
मेरे ऊपर कदंब का भरा फूला वृक्ष है, जिसके पर्नो से धूप छन के मेरे नीलवर्ण माथे पर पड़ रही है, कदंब के कुछ फल नीचे गिर कर फट गए है, उनका लाल रंग हरी दूब का अभिवादन कर रहा है,
शीतल पवन मेरे कलम के घुंगराले बालों को सहला रही है, और मेरी मोरपंखी लहर रही है, मेरा पीत वस्त्र नीले आकाश में सोने जैसा लग रहा है,
अपने एक पैर को दूसरे पर रख अपनी ग्रीवा को वृक्ष के तने से टिकाए मैं लेटा हूं, धीरे धीरे आकाश का रंग मेरे रंग में मिल जायेगा, आकाश भी नीलवार्ण हो जाएगा, हर शाम ऐसा एक क्षण आता ही है जब मेरा और आकाश का रंग एक हो जाता है ,तभी शायद मैया यशोदा ने मेरा नाम श्याम रखा है।
इतने मनभावन क्षण में मैं अक्सर अपनी बंसी बजाता हूं, पर अब बंसी बजाए बहुत वर्ष बीत गए हैं, मेरी बंसी अब मेरे पास नहीं है।
खैर, आप यहां काफी देर से यह सब देख रहे हैं, आप मुझे तो पहचान ही गए होंगे अभी तक, आज मैं आपसे बात करना चाहता हूं, ऐसी बात जो सिर्फ आपके और मेरे बीच रहेगी,
कालखंड मैं कई बार आपसे मिला हूं, भगवद गीता में, उद्धव गीता में, भागवत्म में, अनेक कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, चित्रों में, पर आज मैं सीधे आपसे बात करूंगा, आज बीच में कोई नहीं।
आसमान में बादलों की छटा में थोड़ी जगह बन गई है, और एक मुखाकृति झलक रही है,
गोल सुवर्ण चेहरा , तेज काली भौंहे,सीधी नाक, सुंदर लाल होंठ, गंगा की लहरों जैसे बाल, और एक तीक्ष्ण मुस्कान, यह वही मुस्कान है जिसने वर्षो पहले मुझे कन्हैया से राधा रमण बनाया था, ये वही मुस्कान है,
ये राधिका है, वही राधिका जो मेरी सखा और स्त्री गुरु है, जिसके कारण कृष्ण, कृष्ण है।
इतिहास में लोगों ने बहुत सवाल पूछे हैं,
मेरे लिए राधा कौन है? मेरा और राधा का क्या संबंध है?
पहली बार राधा से मिलने के बाद मैने अपने प्राणनंद काका से पूछा था, कि राधा का अर्थ क्या है?
तब उन्होंने बताया था कि
"रा" का अर्थ प्राप्त होना और "धा" का अर्थ मोक्ष है, राधा का मतलब है मोक्ष के लिए व्याकुल जीव है। यह अर्थ तो केवल शाब्दिक अर्थ है, इसका निर्गुण रूप समझना जितना आसान है उतना कठिन भी,
राधा मेरे लिए प्रेम है
प्रेम! कितना भयानक और भयंकर शब्द!
हम सबने इस पर कितना विचार विमर्श किया है और पाया है की प्रेम दुखदाई है, परंतु मेरा अलग मत है,
मेरा मानना है की सृष्टि के चलते रहने के लिए जिस एकमात्र चीज की आवश्यकता है वो है प्रेम, प्रेम ऐसा बंधन है जो मुक्त करता है, स्वतंत्र नहीं अपितु स्वच्छंद बनाता है, यह एक ऐसी कड़ी है जिससे हर कोई और हर कुछ जुड सकता है,
हम प्रेम में हमेशा होते हैं, प्रेम में पड़ना या गिरना जैसा कुछ नहीं, हर कोई, हर कुछ, प्रेम में है, अभी इस समय जब हम बात कर रहे हैं, हम सब प्रेम में हैं, हां यह अवश्य हो सकता है की हमें उस प्रेम का आभास नहीं हुआ हो, वो आभास देने वाला कोई भी हो सकता है, कोई मनुष्य या कोई वस्तु ही सही। वैसे ही जैसे मुझे राधा की यह मुखाकृति प्रेम का आभास फिर से करा रही है, उस आभास को बनाए रखने के लिए बुद्ध होना आवश्यक है,
प्रेम में बुद्ध होना आवश्यक है,
इसका मतलब यह है की हर कहीं, हर जगह प्रेम ढूंढना, क्योंकि प्रेम केवल किसी व्यक्ति विशेष से ही नही होता , कोई व्यक्ति विशेष उस भाव को बिलकुल जागृत कर सकता है, पर प्रेम का आभास हमे सबसे प्रेम करना सिखाता है, वैसे ही जैसे अपने प्रिय से मिलने के पहले हर छोटी चीज हमे चोट देती है, सब दुखदाई लगता है, पर जैसे ही उस प्रेम का आभास होता है, सबकुछ सामान्य और भावपूर्ण लगता है।
प्रेम सिर्फ एक भाव ही नहीं पर भावों का राजा है, उसमे हर एक भाव छिपा है, भय, क्रोध, विश्वास,निराशा,आनन्द, घृणा, आश्चर्य, आशा, त्याग यह सारे भाव एक भाव का प्रतिनिधित्व करते हैं, प्रेम का।
प्रेम हमारी धारणाओं से परे है, हमारी धारणा प्रेम को केवल दो लोगो तक सीमित करती है, पर क्या ऐसा सचमुच है?
क्या मेरी माता यशोदा का किसी और के बालक को पालना प्रेम नही?
क्या माता देवकी का अपने बालक की सुरक्षा के लिए उसे किसी और को दे देना प्रेम नहीं?
क्या बल दाऊ का सदैव मेरी परछाई बने रहना प्रेम नहीं?
क्या मेरे मुख में ब्रह्मांड देखकर माता यशोदा का मूर्छित हो जाना प्रेम नहीं?
क्या मेरे चले जाने पर उन गोप गोपियों का अश्रु बहाना प्रेम नहीं?
क्या उन गायों का अपने बछड़ों के साथ मुझे भी दूध पिलाना प्रेम नहीं?
क्या गोवर्धन का हमें सजीव रखना प्रेम नहीं?
क्या उन सखाओ का मुझे अपने ही जैसा एक गोप मान लेना प्रेम नहीं?
क्या मेरे विरह में यमुना का सूख जाना प्रेम नहीं?
क्या उद्धव का मुझे अपनाना और सम्मान करना प्रेम नहीं?
क्या चीरहरण के क्षण द्रौपदी का मुझे पुकारना प्रेम नहीं?
क्या पार्थ का मेरे प्रति समर्पण प्रेम नहीं?
क्या कर्ण का सुयोधन का साथ देना प्रेम नहीं?
मन की गहराइयों को टटोलने पर पता लगता है कि हमारे हर एक कर्म का कारण प्रेम ही है।
वर्षो पहले जब मैंने वृंदावन छोड़ा था तब मैय्या यशोदा मुझे ठीक से विदा तक नहीं कर पाईं थी, रह रह कर मूर्छित हो जा रही थीं, आंखो से झर झर आंसू बह रहे थे, पर ऐसा क्यूं था? यशोदा माता तो मुझसे प्रेम करती थी, फिर दुख कैसा? फिर दुख क्यों?
वहीं मेरे नंद बाबा ने कठोर वृक्ष की तरह मुझे विदा करते समय अपनी खड़ग भेंट की थी
मेरे नंद बाबा क्या मुझसे प्रेम नहीं करते थे? उनके आंखो में आंसू क्यों नहीं?
इसका उत्तर यही है कि प्रेम किसी एक का नही होता बल्कि सबका होता है, इसीलिए प्रेम का एक ही ढंग नहीं बल्कि हज़ारों ढंग होते हैं, कोई ढंग बड़ा या छोटा नहीं होता, यही कारण है की प्रेम सबको समतल पर लाता है।
हमे लगता है की प्रेम में लगाव या मोह होना गलत है, हमे लगता है सर्वश्रेष्ठ प्रेम मोह के बिना ही होता है, पर यह कथन कितना सत्य है? कितना व्यावहारिक है?
बिना मोह के प्रेम होना असम्भव है, वैसे ही जैसे जल के स्पर्श से शरीर गीला होगा ही, परंतु यह मोह ही हमारे जीवन में दुख का एक कारण है और इसीलिए प्रेम करना इतना सुगम नहीं, इसीलिए
प्रेम एक साधना है,
एक निरंतर प्रयास है मोह को नष्ट करने का, जल में उतरने पर गीले न होने का एक ही उपाय है, स्वयं जल बन जाना, बिना मोह के प्रेम करने का एक ही उपाय है, स्वयं प्रेम बन जाना, जब आप खुद प्रेम है तब आपको बस उस आभास की जरूरत है किसी और से लगाव की नहीं, स्वयं प्रेम बन जाने पर क्या मेरा है? क्या किसी और का? यह भेद नहीं रहता, सब एक हो जाता है, आप फिर खुद को दूसरे से अलग नहीं जानते, अब सब आपकी बोध में आ जाता है, एक पत्थर, पेड़, जानवर, कीड़े, मनुष्य, बादल, सृष्टि और अन्ततः पूरा ब्रह्मांड, अब आप सबका बोध कर सकते हैं, आपमें सबकुछ समा जाता है, या फिर आप सबमें, और यही सत्य है कि आप ब्रह्मांड का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि आप स्वयं में ही समस्त ब्रह्माण्ड है। प्रेम सत्य का बोध कराता है। प्रेम ही सत्य है। सत्य रास्ता देता है मोक्ष को, और मोक्ष याने राधा।
सत्य की खोज प्रेम के बोध से शुरू होती है। मेरे सत्य की खोज मेरी स्त्री गुरु, मेरी सखा राधा से हुई।
अगर आप प्रेम की साधना में निपुण है तो प्रेम में विरह जैसा कुछ नहीं, प्रेम में विरह नही होता। मेरी राधिका मुझसे अलग नहीं, परंतु राधा मुझमें ही है, प्रेम की साधना का आखरी पडाव एक दूसरे में विलीन होना है, एक हो जाना, मिल जाना, घुल जाना संपूर्ण समर्पण है।
राधा और कृष्ण अलग नहीं अपितु एक ही है। इतिहास में हमेशा गुरु की वंदना पहले होती है, इसीलिए शायद आप सभी राधा पहले और कृष्ण बाद में कहते हैं।
आकाशमंडल से एक सुंदर, मधुर, मनमोहक ध्वज सुनाई दे रही है, ये वही ध्वनि है जो मैं मेरे प्यारे व्रजवासियो के लिए बजाया करता था, मैने उस मुखाकृति की ओर दृष्टि घुमाई, मेरी प्रिय राधिका उस बंसी का वादन कर रही थी, ठीक वैसे ही जैसे मैं करता था, वृंदावन छोड़ते समय मैने वह बंसी राधा को दी थी,
क्योंकि अगर कृष्ण बोल है तो राधे संगीत, कृष्ण जीव है तो राधे जीवन, कृष्ण आकाश है तो राधे बादल, कृष्ण धरती है तो राधे प्रकृति, कृष्ण मंत्र है तो राधे उच्चारण, कृष्ण खड़ग है तो राधे उसकी धार, कृष्ण अगर राधा है तो राधा ही कृष्ण है, वृंदावन की रानी राधिका ही इस ग्वाले कृष्ण का सार है।
कुछ वर्षो पहले यादवों के बचपने की वजह से समस्त कुल को उनके पतन का श्राप मिला था।
मेरे बाईं ओर एक शिकारी धनुष पर बाण चढ़ाए बैठा है। उसका लक्ष्य मेरी बाएं पैर की एड़ी पर है, उस बिचारे को यह पैर झाड़ो में से देखने पर किसी मृग जैसे लग रहे है।
उसने वह तीक्ष्ण बाण मेरे बाईं एड़ी पर मारा है, और निर्मल गर्म रक्त उसमे में से बाहर आ रहा है, मेरी यात्रा शारीरिक रूप में यहीं तक थी, अंतिम समय में मैं प्रेम योग में हूं, राधिका मुझसे हमेशा प्रश्न करती थी,
" तुम इतनी सुंदर ध्वनियां कैसे बजा लेते हो?" और जवाब में मैं मुस्कुरा दिया करता था,
आज मैंने राधा से सवाल किया,
" राधे! तुम इतनी सुंदर ध्वनि कैसे बजा रही हो?" जवाब में वह भी मेरी तरह मुस्कुराकर मुझमें समा रही है।
राधेकृष्ण
कृष्णार्पणमस्तु
Don't know if I've ever seen any other thing as beautiful as this.
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