राधिका
आज आसमान रोज़ के मुकाबले ज्यादा मनमोहक दिखाई पड़ रहा है, एक अलग सौंदर्य और शांति बादलों में से रिस रही है, मेरी नज़र में सामने एक छोटा टीला है जिस पर हरी नर्म दूब ऊगी है, जो गायों के लिए अत्यंत स्वादिष्ट हैं, गायों के बछड़े अपनी मां के थन से दूध पी रहे हैं, आज शकुन अच्छा है। सूर्यदेव की कांति भी आज देखने लायक है, ना तो ज्यादा ताप है ना ही ज्यादा ठंडक, एक समानुपात मौसम है। मेरे ऊपर कदंब का भरा फूला वृक्ष है, जिसके पर्नो से धूप छन के मेरे नीलवर्ण माथे पर पड़ रही है, कदंब के कुछ फल नीचे गिर कर फट गए है, उनका लाल रंग हरी दूब का अभिवादन कर रहा है, शीतल पवन मेरे कलम के घुंगराले बालों को सहला रही है, और मेरी मोरपंखी लहर रही है, मेरा पीत वस्त्र नीले आकाश में सोने जैसा लग रहा है, अपने एक पैर को दूसरे पर रख अपनी ग्रीवा को वृक्ष के तने से टिकाए मैं लेटा हूं, धीरे धीरे आकाश का रंग मेरे रंग में मिल जायेगा, आकाश भी नीलवार्ण हो जाएगा, हर शाम ऐसा एक क्षण आता ही है जब मेरा और आकाश का रंग एक हो जाता है ,तभी शायद मैया यशोदा ने मेरा नाम श्याम रखा है। इतने मनभावन क्षण में मैं अक्सर अपनी बंसी बजाता हूं...